आज भी वह आंदोलन एक सबक है —कि जब अन्याय हद पार कर जाए,तो जनता की आवाज़ दीवारें तोड़ देती है नेगी।

आज भी वह आंदोलन एक सबक है —
कि जब अन्याय हद पार कर जाए,
तो जनता की आवाज़ दीवारें तोड़ देती है नेगी।

“लाठीचार्ज, गोलाबारी और जेल… पर झुकी नहीं आवाज़! — रघुनाथ सिंह नेगी का वो आंदोलन जिसने हिला दी थी सत्ता की नींव”

वर्ष 2006, देहरादून की सड़कों पर जोश और जुनून का ऐसा समंदर उमड़ा जिसे रोक पाना पुलिस-प्रशासन के बस की बात नहीं थी।
जेल से रिहा हुए रघुनाथ सिंह नेगी और उनके साथियों के स्वागत में सहसपुर से हरिपुर और कालसी तक हजारों कार्यकर्ताओं का कारवां नारे लगाते, झंडे लहराते निकला — यह सिर्फ एक स्वागत नहीं, जनता के हक़ की जीत का जुलूस था।

जन संघर्ष मोर्चा उस वक्त हर वर्ग की आवाज़ बन चुका था — मजदूर, किसान, व्यापारी, छात्र… सबकी उम्मीदें उस झंडे के नीचे एकजुट थीं।
लेकिन जनवरी 2007 की वह घटना जिसने पूरे राज्य को झकझोर दिया —
एक गैस सिलेंडर विस्फोट में एक निर्दोष व्यक्ति की मौत, और फिर प्रशासन की उदासीनता और अमानवीयता
न समय पर फायर ब्रिगेड, न उपचार, और ऊपर से मुआवजे के नाम पर ₹2000 की अपमानजनक घोषणा —
मोर्चा का आगबबूला होना स्वाभाविक था

रघुनाथ सिंह नेगी के नेतृत्व में जनता सड़कों पर उतर आई।
जब आवाज़ उठी, तो सत्ता के कानों में सन्नाटा छा गया।
परेशान पुलिस-प्रशासन ने जवाब में निर्दय लाठीचार्ज किया,
और नेगी जी के साथ आकाश पंवार, साबिर भाई और डब्बू जैन को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।

लेकिन जेल की सलाखें भी उस आवाज़ को रोक नहीं सकीं।
रिहाई के बाद, सहसपुर से हरिपुर तक फूलों की वर्षा और नारों की गूंज के बीच
मोर्चा कार्यकर्ताओं ने यह दिखा दिया कि सच्चे संघर्ष को कैद नहीं किया जा सकता।

उस ऐतिहासिक दिन पर रघुनाथ सिंह नेगी ने कहा था —

लाठीचार्ज, गोलाबारी और जेल — ये सब तो झेलना ही पड़ता है जब लड़ाई जनता की हो।


🔥 आज भी वह आंदोलन एक सबक है —
कि जब अन्याय हद पार कर जाए,
तो जनता की आवाज़ दीवारें तोड़ देती है।

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