जनसंघर्ष मोर्चा का जुझारू चेहरा: जब गरीब की झोपड़ी उजड़ने पर आग बन गए थे रघुनाथ सिंह नेगी

जनसंघर्ष मोर्चा का जुझारू चेहरा: जब गरीब की झोपड़ी उजड़ने पर आग बन गए थे रघुनाथ सिंह नेगी
विकासनगर।

वर्ष 2005 — वो साल जब अन्याय के खिलाफ आवाज़ बनकर उभरे थे जनसंघर्ष मोर्चा अध्यक्ष रघुनाथ सिंह नेगी। एक गरीब मजदूर की झोपड़ी को ग्राम सभा द्वारा मा. न्यायालय के स्थगन आदेश के बावजूद उजाड़ दिया गया। पीड़ित व्यक्ति कई बार न्याय की आस में तहसील के चक्कर काटता रहा, लेकिन उसकी पुकार किसी ने नहीं सुनी।

जब मामला रघुनाथ सिंह नेगी के पास पहुंचा, तो नेगी ने गरीब की व्यथा को अपनी आवाज़ बना लिया। उन्होंने तत्काल उप जिलाधिकारी से तीखे शब्दों में कहा — “जब आपने गरीब की ही नहीं सुननी है, तो आपकी यहां कोई आवश्यकता नहीं है।”

इसके बाद नेगी ने जनहित की रक्षा के लिए तहसील के मुख्य द्वार पर ताला ठोक दिया, जिससे पूरा प्रशासनिक अमला हिल गया।

रघुनाथ सिंह नेगी ने उस वक्त साफ कहा था —

“जनता का शोषण कैसे बर्दाश्त कर लें? जब न्यायालय का आदेश होते हुए भी गरीब को न्याय नहीं मिलेगा, तो फिर प्रशासन की क्या जरूरत है।”

इस घटना ने प्रशासनिक तंत्र को झकझोर दिया और जनसंघर्ष मोर्चा की पहचान गरीब, मजदूर और शोषित वर्ग की सशक्त आवाज़ के रूप में और भी मज़बूत हो गई।

नेगी की यह पहल आज भी लोगों के ज़ेहन में इस रूप में दर्ज है कि जब एक गरीब का हक़ छीना जा रहा था, तब एक जननेता ने अन्याय के खिलाफ तहसील के दरवाजे बंद कर दिए, लेकिन न्याय के दरवाजे खोल दिए।

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