जब थम गया था हाईवे — जनसंघर्ष मोर्चा के संघर्ष ने लिखी थी आंदोलन की नई परिभाषा
विकासनगर।
जनसंघर्ष मोर्चा का इतिहास सिर्फ नारों और धरनों तक सीमित नहीं, बल्कि यह उस अडिग जज़्बे की कहानी है जिसने सत्ता के गलियारों को भी झकझोर दिया था। वर्ष 2005 इसका सबसे बड़ा उदाहरण बना, जब रघुनाथ सिंह नेगी के नेतृत्व में राज्य आंदोलनकारियों के सम्मान, पेंशन और नौकरी की मांग को लेकर आम जनता सड़कों पर उतर आई थी।

चिलचिलाती धूप, तपती सड़कें और उफनता जनसैलाब — मगर आंदोलनकारियों के हौसले को कोई नहीं रोक सका। तहसील चौराहे पर जब नेगी अपने साथियों संग डटे, तो देखते ही देखते माहौल ऐसा बना कि ढाई से तीन घंटे तक पूरा हाईवे थम गया। प्रशासन सकते में, शासन बैकफुट पर, और जनता के हक़ की गूंज हर दिशा में सुनाई दे रही थी।
यह सिर्फ एक जाम नहीं था, बल्कि अन्याय के खिलाफ जनता की संगठित आवाज़ थी। उस दिन पूरे क्षेत्र ने देख लिया था कि जनसंघर्ष मोर्चा सिर्फ नाम नहीं — यह एक संकल्प है, जो जनता के अधिकारों के लिए हर कीमत पर खड़ा रहता है।
आज भी वह आंदोलन उस जोश, हिम्मत और जनशक्ति की याद दिलाता है जिसने मोर्चा को “जन के लिए, न्याय के लिए” खड़ा किया।
स्लोगन:
“जन के लिए, न्याय के लिए — संघर्ष ही पहचान है!”
