उपनलकर्मियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चुप क्यों है

उपनलकर्मियों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चुप क्यों है

राजभवन?—मोर्चा का सरकार पर बड़ा हमला

विकासनगर। (उत्तराखंड। बोल। रहा। है।) उपनलकर्मियों के नियमितीकरण और अधिकारों को लेकर जन संघर्ष मोर्चा ने सरकार और राजभवन पर करारा प्रहार किया है। मोर्चा अध्यक्ष एवं जीएमवीएन के पूर्व उपाध्यक्ष रघुनाथ सिंह नेगी ने कहा कि सरकार की ओर से बार-बार कानूनी पेच खड़े करने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में दायर रिव्यू पिटिशन भी खारिज हो चुकी है, ऐसे में अब सरकार के पास आदेशों को लागू न करने का कोई औचित्य नहीं बचता।

नेगी ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि—
“जब उपनलकर्मियों की राह में बाधा डालने को सरकार की एसएलपी और रिव्यू पिटिशन दोनों खारिज हो चुकी हैं, तो राजभवन का दायित्व है कि वह सरकार को तुरंत आदेशों की अनुपालना करवाने के निर्देश दे।”

उन्होंने कहा कि लगभग एक सप्ताह से उपनलकर्मी हाई कोर्ट के आदेशों की अनुपालना को लेकर आंदोलनरत हैं, लेकिन सरकार पूरी तरह मौन है और कमेटियाँ बनाकर सिर्फ टाइमपास कर रही है।

कानूनी पृष्ठभूमि भी स्पष्ट—फिर देरी क्यों?

हाई कोर्ट ने 12 नवंबर 2018 को उपनलकर्मियों के नियमितीकरण और लाभ प्रदान करने का स्पष्ट आदेश दिया था।

सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर की, जिसे 15 अक्टूबर 2024 को खारिज कर दिया गया।

इसके बाद भी सरकार नहीं मानी और 8 नवंबर 2024 को रिव्यू पिटिशन दायर कर दी।

सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर 2025 को रिव्यू पिटिशन भी खारिज कर दी।


नेगी ने कहा—
“जब देश की सर्वोच्च अदालत दो बार सरकार की दलीलें नकार चुकी है, तब भी आदेश लागू न करना न्याय और संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ है।”

विधायक-मंत्रियों पर भी साधा निशाना

नेगी ने प्रदेश सरकार पर तीखा हमला करते हुए कहा—
“प्रदेश का दुर्भाग्य है कि मंत्री-विधायक सरकारी सेवक न होते हुए भी लाखों रुपये वेतन-भत्ते के रूप में ले रहे हैं, जबकि उपनलकर्मियों को उनका हक देने में सरकार आनाकानी कर रही है।”

मोर्चा की सीधी मांग

मोर्चा ने राजभवन से मांग की है कि—
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के आदेशों की तत्काल अनुपालना सुनिश्चित करने के लिए सरकार को स्पष्ट निर्देश जारी किए जाएँ।

पत्रकार वार्ता में भीम सिंह बिष्ट और अतुल हांडा भी उपस्थित रहे।

यह मुद्दा एक बार फिर राज्य में कर्मचारी अधिकारों और सरकारी संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़ा करता है।