न्याय की लड़ाई में अकेले खड़े हुए रघुनाथ सिंह नेगी — जब सच के साथ खड़े होना ‘आग से खेलने’ जैसा बना दिया गया!
देहरादून।
वर्ष 2013—एक ऐसा साल जब उत्तराखंड में भ्रष्टाचार और कर्तव्यहीनता के खिलाफ आवाज उठाने की कीमत किसी ने अगर सबसे ज्यादा चुकाई, तो वह थे रघुनाथ सिंह नेगी। बल्लीवाला फ्लाईओवर को फोरलेन बनाने और ईपीआईएल जैसी ब्लैकलिस्टेड कंपनी की कार्यप्रणाली के खिलाफ दायर जनहित याचिका ने पूरा सिस्टम हिलाकर रख दिया था। मगर सच के इस संघर्ष का अंजाम चौंकाने वाला था।

जांच फ्लाईओवर की नहीं, बल्कि नेगी की!
नेगी द्वारा दायर जनहित याचिका में फ्लाईओवर निर्माण की गंभीर खामियों और ईपीआईएल की पात्रता पर सवाल उठाए गए थे।
लेकिन सरकार द्वारा महाधिवक्ता के माध्यम से अदालत को भ्रामक जानकारी देने के बाद, मा. मुख्य न्यायाधीश ने जांच का रुख फोरलेन और कंपनी से मोड़कर नेगी की ओर कर दिया।
यह वह पल था जब सिस्टम की संवेदनहीनता अपने चरम पर दिखाई दी।
“आपको आग से खेलने का शौक है, मैं आपके केस नहीं लड़ सकता” — वकील ने छोड़ दिया साथ
जैसे ही नेगी के खिलाफ जांच के आदेश हुए, उनके वकील ने खुले शब्दों में कहा—
“आपको आग से खेलने का शौक है, मैं आपके केस नहीं लड़ सकता।”
इतना ही नहीं, वकील साहब ने उनके सभी केसों की फाइलें बाहर रखवा दीं।
एक ईमानदार नागरिक का अकेला पड़ जाना इस बात का सबूत था कि सच्चाई की चौखट पर खड़े होना आसान नहीं होता।

लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई — एक बहादुर वकील ने थामा हाथ
जहाँ एक वकील नेगी का साथ छोड़ गए, वहीं एक साहसी अधिवक्ता श्री योगेश पचौलिया आगे आए और उन्होंने नेगी के सभी मुकदमे खुद लड़े। यह कदम सिर्फ कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि सत्य और साहस का प्रतीक बन गया।
अगर गंभीरता दिखाई होती, तो बच जाती 15–20 जानें…
बल्लीवाला फ्लाईओवर पर संरचनात्मक खामियों के कारण वर्षों में हुईं 15–20 मौतें इस बात का कड़वा प्रमाण हैं कि अगर समय पर जांच फ्लाईओवर की होती, नेगी की नहीं—तो कई परिवार आज उजाड़ने से बच जाते।
यह सिर्फ एक मामला नहीं—यह चेतावनी है
जब एक आम नागरिक सिस्टम की खामियों को उजागर करता है और उल्टा उसी पर कार्रवाई हो जाती है, तो यह न्याय व्यवस्था पर गहरा प्रश्नचिह्न है।
“ईमानदारी की लड़ाई लड़ने में खुद को आग में झोंकना पड़ता है।”
रघुनाथ सिंह नेगी का यह संघर्ष दर्शाता है कि सच्चाई का रास्ता हमेशा कठिन होता है, लेकिन इतिहास उसी का सम्मान करता है जो सच के लिए अकेले खड़े होने का साहस रखता है।
यह घटना हमें याद दिलाती है—
यदि शासन व न्यायपालिका समय पर सही दिशा में कदम उठाती, तो बल्लीवाला फ्लाईओवर पर निर्जीव कंक्रीट के नीचे दबकर मरने वाले लोग आज जीवित होते।
यह मामला आज भी सिस्टम के लिए आईना है, और ईमानदार आवाजों के लिए प्रेरणा।
